अखिलेश की पहले पलायन-दंगाइयों पर चुप्पी और अब आतंकवाद पर खामोशी

नीरज शर्मा
ब्यूरो रिपोर्ट

लखनऊ । उत्तर प्रदेश में तीन चरणों का मतदान हो चुका है। चौथे चरण का मतदान 23 फरवरी को सम्पन्न हो जाएगा। विभिन्न दलों नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार बना हुआ है। समाजवादी पार्टी जहां भाजपा को मंहगाई और बेरोजगारी को हथियार बनाए हुए हैं तो वहीं बीजेपी ने रणनीति के तहत पहले दो चरणों के चुनाव में पश्चिमी यूपी से हिन्दुओं के पलायन, दंगे और दंगाइयों को टिकट देने के बहाने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को घेरा तो तीसरे चरण में बीजेपी ने परिवारवाद के नाम पर सपा पर तंज कसे। चौथे चरण में आतंकवाद की इंट्री हो गई। गुजरात में सीरियल ब्लास्ट के 38 आरोपियों को कोर्ट द्वारा दोषी करार देते हुए फांसी से लेकर 11 को आजीवन कारावास तक की सजा सुनाई तो बीजेपी ने गुजरात के सीरियल ब्लास्ट की घटना का कनेक्शन समाजवादी पार्टी से जोड़ दिया। क्योंकि ब्लास्ट की जिस घटना में आजमगढ़ के रहने वाले एक आतंकवादी को फांसी की सजा सुनाई गई थी, उसके पिता समाजवादी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे थे। कोर्ट का फैसला आते ही प्रधानमंत्री मोदी से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम बीजेपी नेताओं ने अखिलेश को घेरने में कोई कोरकसर नहीं रखी। उन्नाव में प्रधानमंत्री मोदी के तो हरदोई में योगी के निशाने पर अखिलेश रहे। उन्नाव में मोदी ने सपा के चुनाव निशान साइकिल को लेकर अखिलेश पर खूब शब्दबाण चलाए। बीजेपी वालों ने गुजरात में सीरियल ब्लास्ट पर कोर्ट के फैसले पर तो अखिलेश को घेरा ही इसके अलावा आतंकवाद के वह बंद पन्ने भी खोल दिए जिसकी इबारत अखिलेश सरकार के समय तमाम खूंखार आतंकवादियों से मुकदमें वापस लेकर लिखी गई थी। इसी लिए राजनीति के जानकार भी कहते हैं कि आतंकी हमले के आरोपितों के प्रति सपा द्वारा साफ्ट कार्नर अपनाने का भाजपा का आरोप पूरी तरह निराधार नहीं है। अखिलेश सरकार के दौरान 2013 में सात जिलों में आतंकी हमले से जुड़े 14 केस एक साथ वापस लिए गए थे। हालांकि, कुछ मामलों में अदालत के मना करने के बाद आरोपितों को 20-20 साल तक की सजा तक हुई थी। सीएम रहते अखिलेश ने जिन 14 मामलों को वापस लेने का आदेश दिया था। उनमें लखनऊ के छह और कानपुर के तीन मामले थे। इसके अलावा वाराणसी, गोरखपुर, बिजनौर, रामपुर और बाराबंकी का एक-एक मामला था। पांच मार्च, 2013 को वाराणसी के जिस मामले को वापस लिया गया था, वह सात मार्च 2006 में संकट मोचन मंदिर एवं रेलवे स्टेशन कैंट पर हुए सिलसिलेवार बम धमाके से जुड़ा था। वाराणसी में एक प्रेशर कुकर में घड़ी लगा विस्फोटक दशाश्वमेध घाट पर किया गया था। इस आतंकी हमले में 28 लोगों की मौत हुई थी और 101 से अधिक लोग घायल हो गए थे। इसमें मुख्य आरोपित आतंकी संगठन हूजी से जुड़ा शमीम अहमद है। वैसे केस वापस लेने के बावजूद यह मामला अदालत में लंबित है। इसी तरह से 20 मई, 2007 को गोरखपुर के बलदेव प्लाजा, जरकल बिल्डिंग और गणेश चौराहा पर हुए सिलसिलेवार विस्फोट के मामले को राज्य सरकार ने वापस ले लिया। वैसे अदालत ने सरकार के आदेश को मानने से इन्कार कर दिया और बाद में दोषियों को 20 साल सश्रम कारावास की सजा हुई। वहीं कई मामलों में अदालत ने सरकार के फैसले को मानते हुए केस को खत्म कर दिया और आरोपित पूरी तरह से दोषमुक्त हो गए। चौथे चरण के मतदान के लिए हरदोई में पार्टी प्रत्याशियों के लिए जनसभा करने पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा पर खूब निशाना साधा। शाहाबाद की जनसभा में मुख्यमंत्री बोले, गुजरात में आतंकियों को फांसी की सजा सुनाई गई तो सपा को बहुत तकलीफ हुई। देश के दुश्मन भी इनके दोस्त हैं। उन्होंने कहा, क्या अखिलेश प्रदेश की जनता को बताएंगे कि उन्होंने राम मंदिर और सीआरपीएफ कैंप पर हमला करने वाले आतंकवादियों के मुकदमें क्यों वापस लिए थे।

सीएम योगी बोले, आज मैं इसीलिए आपके पास आया हूं। जब 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार आई थी तो इन्होंने सबसे पहले आतंकवादियों के मुकदमें वापस लिया। एक-दो नहीं बल्कि, डेढ़ दर्जन आतंकवादियों के मुकदमें वापस लिया था। मैं आज समाजवादी पार्टी के मुखिया से पूछना चाहता हूं कि उनको जनता की अदालत में स्पष्टीकरण देना चाहिए कि उन्होंने किस हैसियत से उत्तर प्रदेश और देश की सुरक्षा के लिए घातक बने आतंकवादियों के मुकदमों को वापस लेने का दुस्साहस किया था। आखिर सपा को आतंकियों से इतनी हमदर्दी क्यों है।

गौरतलब हो, गुजरात के एक न्यायालय ने गुजरात में सीरियल ब्लास्ट के मामले में 38 आतंकवादियों को फांसी की सजा सुनाई थी। उसमें आठ आतंकियों का संबंध आजमगढ़ से है। एक आतंकी का बाप समाजवादी पार्टी का प्रचारक है। हरदोई में सपा प्रमुख अखिलेश पर तंज कसते हुए योगी ने कहा,‘मैं अब्बा जान तभी बोलता था, क्योंकि मैं इनकी हरकतों को देखता था। सपा को जनता से माफी मांगनी चाहिए। सपा उत्तर प्रदेश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रही है। मैं पूछना चाहता हूं क्या राजनीति इतनी बड़ी हो गई है कि देश की सुरक्षा के लिए कोई जगह नहीं है। सपा को इस पर विचार करना चाहिए। लब्बोलुआब यह है कि बीजेपी आलाकमान अखिलेकश राज में हुए साम्प्रदायिक दंगों, आतंकवाद,गुंडा-माफियाओं को संरक्षण, लव जेहाद, तुष्टिकरण की सियासत और पारिवारिक कलह के सहारे घेरकर सपा प्रमुख की बोलती बंद करने में लगी है, जिसमें वह कामयाब भी होती दिख रही है। अखिलेश बीजेपी नेताओं के किसी भी आरोपों का जबाव नहीं दे रहे हैं। इसी वजह से सपा प्रमुख की विश्वसनीयता पर तो सवाल खड़े हो ही रहे हैं आम जनता के बीच भी अखिलेश की इमेज को नुकसान हो रहा है। वही राजनीति के कुछ जानकार यह भी कह रहे हैं सपा प्रमुख अखिलेश यादव बीजेपी के उठाए मुद्दों पर बयानबाजी करने के बजाए अपने द्वारा तैयार की गई सियासी पिच पर बैटिंग करने मैं लगे हैं, यदि अखिलेश बीजेपी नेताओं के बयान का उत्तर या सफाई देने लगे तो वह अपने द्वारा तैयार किए गए मुद्दों से भटक जाएंगे जो वह नहीं चाहते हैं।

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